शुक्रवार, 24 जून 2022

श्री त्रिलोकी नाथ धाम यात्रा (भाग -1)

कुल्लू से गोंधला फोर्ट 

त्रिलोकी नाथ धाम -लाहौल-स्पित्ति  हिमाचल प्रदेश 
                      अब की बार श्री त्रिलोकीनाथ धाम  की यह मेरी कुल मिलाकर पांचवी यात्रा थी और मेरे स्कूल स्टाफ के साथ पहली यात्रा cum पिकनिक  थी और सिस्सू तक, स्कूल स्टाफ के साथ दूसरी बार। हमेशा की तरह इस पिकनिक का मुख्य उद्देश्य अपने दिल व दिमाग को  रिफ्रेश करना ,घुमक्कड़ी का आन्नद लेना ,नई जगह की भेाैगौलिक विशेषताओं,लोगो के रीति-रिवाज़, रहन -सहन, वेशभूषा  को जानना-समझना था  |

                   पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार दो टेम्पो ट्रेवलर में से एक कुल्लू ढालपुर से कुल्लू मनाली सडक मार्ग व्यास नदी के लेफ्ट बैंक तथा दूसरी राईट बैंक कुल्लू मनाली सड़क मार्ग की तरफ रहने वाले स्टाफ को लेकर जाना सुनिश्चित था | हमारी टेम्पो ट्रेवेलर सुबह 6 बजे के करीब मेरे लेफ्ट बैंक की ओर स्थित घर लुगड़ भट्ठी पहुंची | जिसमें घुमक्कड़ी की शौकीन, हमारी प्रिंसिपल श्रीमती कल्पना शर्मा व् अन्य स्कूल स्टाफ सुबह सुबह गाड़ी में लगे भजन के साथ गाकर आनंद ले रहे थे | मेरे गाड़ी में सवार  होने के बाद, आगे  गाँव सेऊबाग से हमारी पाठशाला के शारीरिक शिक्षा अध्यापक श्री प्रेम नेगी (PET) एवं तेज राम शास्त्री पिकनिक में फ्रूट चाट (फ्रूट्स व् दूध क्रीम की एक स्वीट डिश) बनाने में उपयोग होने वाले बर्तन व् अन्य जरूरी सामग्री के साथ हमारी गाड़ी  में सवार हुए |

माता दशमी वारदा मंदिर काईस

                काईस माता दशमी वारदा मंदिर के सामने से मैडम सुमन तथा हिरनी से बलवीर एवं राजेन्द्र सर गाड़ी में सवार होते हैं | नाच-गाना व् सफ़र का आनंद लेते-लेते लरांकेलो ,घुडदौड़, बाया नगर से होते हुए पतलीकुहल कब पहुंचे , पता ही न चला | जहाँ हमारी दूसरी गाड़ी ( टेम्पो ट्रेवलर) ,राईट बैंक कुल्लू मनाली सड़क मार्ग पर कुछ समय पहले पहुँच कर हमारा इंतजार कर रही थी | पतलीकुहल से फ्रूट चाट के लिए ज़रूरी फल –फ्रूट खरीद कर हमारी दोनों गाड़ियाँ पर्यटन नगरी मनाली की ओर चल पड़ी |  कभी मनाली, बाहंग - पलचान –के बर्फ़ से ढके पर्वतों व् प्राकृतिक सोंदर्य का आनंद लेते, तो कभी  गाड़ी में बजते लोकल ,पंजाबी ,हिंदी गानों पर थिरकते |सभीअपने-अपने ढंग से इस पिकनिक का आनंद  लेते |


गाड़ी के अंदर गाते -थिरकते 
              सफ़र चलते चलते सोलंग नाला कुछ समय के लिए थम जाता है ,सोलंग नाला पर्यटन स्थल मनाली से13 किलोमीटर मनाली लेह मार्ग पर स्थित अपने प्राकृतिक सौंदर्य, प्राकृतिक आइस स्कीइंग स्लोप,पैराग्लाइडिंग और पास में स्थित अंजनी महादेव तीर्थ स्थल के लिए विश्व विख्यात है | अंजनी महादेव तीर्थ स्थल भी कश्मीर घाटी के अमर नाथ गुफा की तरह बर्फ से बनी  शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है | हलांकि यहाँ यह बर्फ से बनी शिवलिंग सर्दियों में मात्र फ़रवरी-मार्च तक ही देखी जा सकती है| कुछ समय सोलंग मे रुकने के बाद हम धुन्धी होते हुए ,अटल टनल के पास कुछ समय लिए रुके |

अटल टनल प्रवेश द्वार (साउथ पोर्टल )
 
       अटल टनल बीआरओ (Boarder Road organization) के अन्तर्गत सामरिक दृष्टि से तैयार, विश्व की सबसे ऊँची सड़क टनल है | इसे  हिमालय की उतरी पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के रोहतांग दर्रा के तल के आरपार,समुद्र तल से3100मीटर (10171ft)की ऊंचाई पर बनाया गया है | इसका साऊथ  पोर्टल कुल्लू जिला व् नार्थ पोर्टल लाहौल-स्पित्ति को जोड़ता है | 


अटल टनल   (नार्थ पोर्टल )  
                 
          यह टनल विश्व के सबसे ऊँचे मनाली-लेह सड़क मार्ग से कुल्लू व् लाहुल-स्पीती को पूरा बर्ष कनेक्टिविटी प्रदान करती है | इस टनल की लम्बाई 9.020 किलोमीटर चौड़ाई 10 मीटर और ऊंचाई 5.25 मीटर है | इस टनल के बनने से मनाली-लेह की दूरी लगभग 46 किलोमीटर कम हुई है| यह देश की सबसे Hi-tech टू- लेन टनल है ,जिसमें प्रत्येक  200 मीटर पर एअर क्वालिटी  कण्ट्रोल सिस्टम,प्रत्येह 300m पर सीसीटीवी सिक्यूरिटी सिस्टम है |और यह टनल 4G सिग्नल और  एक इमरजेंसी एग्जिट टनल की नवीनतम सुविधाओं से भी लैस है |

अटल टनल के अंदर का नज़ारा

 इस टनल  को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 10 अक्टूबर 2020  को राष्ट्र को समर्पित किया है |


अटल टनल राष्ट्र को समर्पित करते हुए 
                     कुछ फोटो व् प्रकृति का आनंद लेने के बाद हमने अटल टनल में प्रवेश किया| टनल के  इस सफ़र में  ऐसा महसूस हो रहा था कि किसी गेम स्टेशन में बैठ कर 3-D कार गेम का आनंद ले रहे हो | लगभग 12 मिनट के इस रोमांचक सफ़र के बाद हम टनल  के नार्थ पोर्टल , जिला लहुल स्पीती में थे | यहाँ हिम सिंचित चंद्रा नदी के समानांतर चंद्रा वैली ,उपर नीला असमान, हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखला जन्नत सा एहसास लिए थी |

स्कूल स्टाफ के साथ यादगार फोटो 


अटल टनल के नार्थ पोर्टल के सामने लिया गया फोटो 
   
                   कुछ समय तक प्रकृति के इन खूबसूरत नज़ारों को कैमरे में कैद कर, हमारा सफ़र सिस्सू नामक नये उभरते पर्यटन स्थल कीओर बढ़ा | सिस्सू, सिस्सू झील,सिस्सू वाटर फ़ॉल, हेली पैड,ले-जिंग म्यूज़ियम, राजा घेपन मंदिर व् अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए जाना जाता है |

             सिस्सू के एक होटल में हम सभी ने नाश्ता किया, जिसका सारा इंतज़ाम हमारी प्रिंसिपल के बेटे,सिस्सू के सरकारी अस्पताल में कार्यरत डॉ० उदय भूषण ने किया था | उसके पश्चात् ले-जिंग म्यूज़ियम  सिसु में 10-15 मिनट इसमें रखे ठेठ लाहुली कल्चर (Typical Lahuli culture) में उपयोग होने वाली पारम्परिक पोशाकें,पत्थर,धातु व् जानवरों की ऊन-खाल से बने रोज़मर्रा के ज़रूरी सामान,बठने ,पहनने, ओढने के वस्त्र,को देखा, जो इस कल्चर की रिचनेस का एहसास दिलाता है | लेकिन हम आधुनिकता के चक्कर में इस धरोहर को भूलते जा रहे है |

              उर्दू  में लिखी गई गीता ,यहाँ का मुख्य आकर्षण है   | 

म्यूज़ियम में रखे सामान 
 
उर्दू में लिखी गीता की प्रति 

                  सिसु में राजा घेपन के मन्दिर में दर्शन के बाद 16 किलोमीटर आगे  मनाली -लेह राष्ट्रीय सड़क मार्ग पर  तांदी की ओर "खंडर व्यां करते है कि ईमारत कभी आलीशान रही होगी" को चरितार्थ करता  गोंधला फोर्ट (किला) अपने अंतिम पड़ाव पर दिखा | हालाँकि स्थानीय प्रशासन इसके बचाव के लिए प्रयासरत है लेकिन समय के सामने किस की चली है | 
             17वीं शताब्दी के उतरार्ध में लदाख रियासत के विघटन के बाद लाहौल, कुल्लू के शासकों के हाथों में आ गया और लाहौल को कुल्लू रियासत में विलय कर दिया | कुल्लू के शासकों ने  यहाँ के ठाकुरों में से एक को यहाँ का बज़ीर बना दिया ,और उसे राजस्व अधिकारी के रूप में न्यायिक व् प्रशासनिक शक्तियां प्रदान कर दी और कुल्लू के शासक अपनी रियासत के देख-भाल के लिए कभी-कभार यहाँ आते जाते रहते थे |

गोंधला किला 

           गोंधला किला ,गोंधला के ठाकुर शासकों का महल था |  इस किले का निर्माण 1700 ई० में कुल्लू के राजा मान सिंह द्वारा किया गया था | ये किला काष्ठकुणी शैली में बना 7 मंजिला इमारत है| इस किले की उपरी दो मंजिलों के चारों ओर लकड़ी द्वारा बनाया बरामदा है | कहा जाता है कि  यहाँ का ठाकुर जनता की मुरादों को सुनने व् अपना फैसला सुनाने के लिए भी इस बरामदे का  उपयोग करता था | किले को बनाने  में उपयोग हुई लकड़ियों को मनाली के जंगलो से लाया गया था | इस किले की पांचवीं  मज़िल् में पूजा घर था | इस पूजा घर में कई देवी देवताओं की मूर्तियाँ रखी होती थी और दीवारें थांका पेटिंग से  चित्रित की गई थी | इस इमारत में ठाकुरों द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले तलवारों, बंदूकों ,चमड़े की ढालो,चमड़े से बने सुरक्षा कवच,पूजा की मूर्तियाँ, चमड़े के घड़ेनुमा पानी रखने के बर्तनों के अवशेष अभी भी मौजूद है | लेकिन ईमारत के जर्जर हालत होने की वजह से सुरक्षा कारणों से अंदर प्रवेश बंद कर दिया गया है |  

शेष अगले भाग में ........

गोंधला फोर्ट (किला)


                                       

      

8 टिप्‍पणियां:

  1. इस ब्लॉग को पढ़ने के लिए सभी पाठकों का धन्यवाद ......

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  2. इस ब्लॉग को पढ़ते हुए लगा कि यह लेखक का नहीं मेरा ही यात्रा-वृत्तान्त है। लेखक महोदय ने इस छोटे से ब्लॉग में पुरातत्व से लेकर बच्चों के 3D गेमिंग के अनुभव, जैसे अनेक विषयों का यथायोग्य वर्णन किया है। संक्षेप में कहें तो, श्री दविन्द्र ठाकुर जी ने ब्लॉग में गागर में सागर भरने कार्य किया है।

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    1. इस प्रेरणादायक टिप्पणी के लिए आपका बहुत -बहुत धन्यवाद |

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  3. भाइजी बहुत बहुत शभकामनाएँ 🙏👌

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